जिंदगी में जोखिम लेकर कुछ नया की चाहत लिए प्रयोग करने वाले लोग कम ही होते हैं। कम से कम से मध्यमवर्गीय तबके में तो शायद लाखों में कुछ ही होंगे। डर लगता है...कहीं फेल हो गए तो...। जो मिल रहा है, वो भी न हाथ से निकल जाए..तो भइया जो है, जितना है..उतना ही सही। लेकिन जिसके पास खोने का कुछ न हो...और लड़-भिड़कर भी मन का काम करने की जिनकी जिजीविषा बनी रहती है....वैसे ही लोग फिल्ममेकर अनुराग कश्यप की तरह बन पाते हैं। गोरखपुर में पैदा होने वाला एक आम शक्ल सूरत वाला लड़का...साइंटिस्ट बनना चाहता है, लेकिन बन जाता है स्क्रिप्ट राइटर और फिर डायरेक्टर। नाटक का खाका तो उसके दिमाग में रहता है, लेकिन नाटकीयता उसे पसंद नहीं। एसी में बैठने वालों को उस कस्बे का दर्द कैसे महसूस हो सकता है, जहां 24 घंटे में छह घंटे ही बिजली आती हो, वो भी एक हफ्ते दिन में अगले हफ्ते रात में। राशन की दुकान में मिट्टी के तेल के लिए हाथ में केन लेकर लाइन लगाने वालों का पसीना...इसी लाइन में खड़ी किशोरी को सामने पान की दुकान में खड़े मनचले का घूरना। कहने का मतलब ये कि...वो सब जो एक आम आदमी महसूस करता है। खबरिया चैनलों में फिल्म समीक्षक जो भी कहें लेकिन अनुराग की हर फिल्म में आम आदमी की फिल्म का अहसास होता है। उनके कलाकार भी गिटार लिए, बाल बढ़ाए ड्यूड टाइप के नहीं बल्कि आम चेहरे-मोहरे वाले ही हैं। चाहे उनकी फिल्म ब्लैक फ्राइडे देखिए या हालिया रिलीज गैंग आफ वासीपुर। कुछ लोग कह सकते हैं कि बहुत गालियां हैं। जबरदस्त मार-काट है। लेकिन क्या वाकई ऐसा होता नहीं। देश के हिंदी पट्टी...कम से कम यूपी के अखबार झांक डालिए। कोई दिन ऐसा जाता हो, जब कहीं एक तो कहीं चार-चार का एक साथ मर्डर न होता हो। गाली गलौज की बात कहना ही बेमानी। रोजाना की इस हकीकत को पिरोकर परदे में दिखा दिया गया तो वो फिल्म ओनली फार एडल्ट हो गई।

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